Third Eye

नीचे लिखी पंक्तिया साधक की उस अवस्था को दर्शाती हैं, जब वह लगातार आग्नेय चक्र पर संवेदना महसूस करता है। कभी कभी ये संवेदना आग्नेय चक्र से सर पर भी महसूस होती है। साधक सोचता है की कब आग्नेय चक्र खुलेगा और कब ये संवेदनाएं आध्यात्मिक प्रगति में बदलेंगी।

नवनीत युवतिया नाचत छम छम
नयनन बीचत आत रे
कभी इधर ठुमक कभी उधर मटक कर
पल पल आस जगात रे।

nachat

इठलाती कूदत है इत् उत्
अटरिया पर चढ़ जात रे
हम हसत हसत कुछ कह न सकत है
होश हवास गवात रे।

 

नाचत नाचत यह न थकत है
तेजी बढ़ती जाए रे
हम देखत और विचार करत हैं
कब सूरज चढ़ जात रे।

 

सूरज चढ़ जाए, ऊष्मा लाए
घर अटरिया चमकाए रे
ऊष्मा से नृतकी जल जाए
मुझ में लय हो जाए रे।

– विक्रांत

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